अवध – असम एक्सप्रेस

डिस्क्लेमर – यह एक सत्य घटना पर आधारित काल्पनिक प्रेमकथा है. इसके सभी मुख्य किरदार काल्पनिक है और इनका 2 अगस्त 1999 को हुई सत्य घटना से कोई भी संबंध नही है. कथा की रंजकता को बनाये रखने के लिए कृपया इस घटना के बारे में गूगल पर कोई भी सर्च न करें. घटना का विस्तार से वर्णन कथा में किया गया है. कथा पढ़ने के बाद ही इस घटना के बारें में जानें.

31 जुलै 1999

लखनऊ रेलवे स्टेशन पर एक प्रेमी जोड़ा भागते भागते पहुँचा. पीछा करनेवाले लड़की के घरवाले भी कुछ सेकंड के अंतराल में पहुँचे. शाम का वक्त था, स्टेशन पर काफी भीड़ थी. फिर भी लड़की के घरवाले होश खो बैठे और लड़के को मारने लगे. भीड़ ने वही किया जो भीड़ हमेशा करती है, देखती रह गई. इतने में वहां पर रेलवे पुलिस अधिकारी आये और उन्होंने लड़की के घरवालों को रोकने की कोशिश की, लेकिन लड़की के किसी चचेरे भाई ने देसी कट्टा निकाल के हवा में फ़ायरिंग की ताकि वो पुलिस अफसर भाग जाए. उसी प्लेटफार्म पर खड़ी अवध असम एक्सप्रेस के टीटीई ये सब देख ही रहे थे. पहले से 6 घण्टे देरी से चल रही उनकी रेलगाड़ी इस हादसे की वजह से शायद और देरी से जाती. वो ट्रेन से उतरे और सीधा लड़की के चचेरे भाई के गालों पर करारा तमाचा जड़ दिया. उसके हाथ से पिस्टल छीनकर उसीपर तान दिया और बोले, “लड़की को लड़के के साथ जाने दो. मुझे मालूम है आप प्रदेश के बड़े नेता यादव साहब के रिश्तेदार है और ये लड़की उनकी सगी भतीजी है, लेकिन मैं भी उत्तरप्रदेश की सारी संघ शाखाओं में अच्छी खासी पहचान रखता हूँ. मामला राजनीति में जायेगा, अगले चुनाव में भतीजी चाचा के खिलाफ खड़ी होगी.  इससे अच्छा तो अभी इसे जाने दीजिए.”

इतने में ट्रेन शुरू हो गई और चलती ट्रेन में बैठकर नूपुर और राकेश भाग गए. दोनों बालिग युवा असल मे पढ़े लिखे थे, लखनऊ में एक कॉलेज में प्रोफेसर की नौकरी करते थे. राकेश चतुर्वेदी ब्राम्हण था और नूपुर थी यादव समाज से. नब्बे के दशक के यूपी में भसड़ मचने के लिए इतना काफी था. बस, किसी तरह नूपुर और राकेश भाग निकले.

शर्मा साहब बहुत बहुत शुक्रिया. और ये कहाँ से सुझा आपको? ये राजनैतिक दाँव बड़ा सही डाला आपने. अभी बस आप अपना ध्यान रखिये” राकेश ने कहा.

“राकेश बेटे, मैं सच मे संघ से हूँ और मेरी सच मे बहुत पहचान है. आज इस ट्रेन में बैठने तक कि जगह नहीं है,उस दिन ऐसेही हालात में तुमने  न सिर्फ अपनी जगह मेरी गर्भवती पत्नी को दे दी, बल्कि गुवाहाटी में देर रात को पहुंचने पर उसे उसके मायके तक छोड़ आये. ये कर्जा तबसे है. तुम्हारी वजह से आज मेरी पत्नी और बेटी सुरक्षित है. तुम्हारी प्रेमकथा में मद्त करने की एक और वजह है हिन्दू एकता. जब आप जैसे प्रेमी युगल जात भुलाकर मोहब्बत करने लगे तो निश्चित ही हिन्दू ऐक्य एवं हिन्दू राष्ट्र दूर नहीं.” कहते हुए टीटीई शर्मा जी निकल लिए.

“कलकत्ते में हम क्या करनेवाले है राकेश?” नूपुर ने पूछा.

“हम कलकत्ता जा ही नही रहे. हम गुवाहाटी जा रहे है. ये तो मैंने अपना पता छुपाने के लिए कहा था. मैने देखा है तुम्हारे रिश्तेदार तुमसे खास मोहब्बत नहीं करते. ये तो तुम्हारे माता पिता के 1981 की रेल दुर्घटना में गुजरने के बाद सिर्फ समाज की नजरों में अच्छा दिखने के लिए तुम्हे यादव साहब ने पाल-पोसकर बड़ा किया. भूल जाओ उस राजनैतिक दलदल को नूपुर. हम कम पैसे से जियेंगे लेकिन अपनी मर्जी से जियेंगे.” राकेश ने कहा

कुछ रोते हुए नूपुर राकेश की बाहों में सिमट गई. उस इकलौती सीट पर ये युगल किसी तरह मुश्किल से सोने की कोशिश कर रहा था. टीसी के डिब्बे में बिना टिकट जानेवाले ये दुनिया के शायद पहले यात्री थे.

राकेश और नूपुर पूरे इंतजाम से भाग निकले थे. अपनी ही नौकरी से इकट्ठा किये हुए कुछ पैसे, खाने पीने का सामान, कपड़े सब कुछ. गुवाहाटी में किसी कॉलेज में जूनियर प्रोफेसर का जॉब राकेश ने टीटीई शर्मा जी की मदद से लिया था. भागने की प्लानिंग में शर्मा जी का अहम हिस्सा था. गुवाहाटी में अपने ससुराल में शर्मा जी ने इनका किराये से रहने का इंतजाम किया था. अपनी जान पर खेलकर शर्मा जी इनकी मदद कर रहे थे.

सफर काफी लंबा था. पूरा यूपी और बिहार बीच से काटते हुए ये गाड़ी गुजर रही थी. अभी चार दिन पहले ही भारत ने कारगिल की जंग जीती थी. जंग से लौट रहे तकरीबन 500 सिपाही भी इसी ट्रेन में थे. हर स्टेशन पर भीड़ चढ़ती-उतरती जा रही थी. लगभग 20 घंटे हो चुके थे और अभी भी 36 घंटे थे गुवाहाटी आने में. टीटीई शर्मा साहब पूरी कोशिश में थे कि राकेश और नूपुर को कोई एसी डिब्बेमें सीट मिलें पर यहाँ सेना के जवानों तक को सीटें मिल नहीं रही थी तो इस बिना टिकट के हंसो के जोड़े को क्या ही मिलता.

टीटीई के डिब्बे की खास बात ये थी कि ये काफी साफ था और यहाँ कोई आता जाता नहीं था. शर्मा साहब जैसे ही टिकट चेक करने निकलते, इस हंसो के जोड़े का प्रणय वैसेही आरंभ होता. शायद शर्मा साहब भी यही जानकर ज्यादातर समय टिकट चेकिंग में ही लगाते.

वैसे शर्मा साहब किशनगंज में उतरने वाले थे. वहाँ से वापसी मार्ग पर जानेवाली ब्रम्हपुत्र मेल में उनकी ड्यूटी लगी थी. दूसरे दिन, 1 अगस्त 1999 की शाम होने को आई थी. गाड़ी अब लगभग सात घण्टे की देरी से चल रही थी. किशनगंज शायद आधी रात को ही आनेवाला था.

“राकेश, मैं गुवाहाटी में क्या करूँगी? मुझे भी तो नौकरी चाहिए ना.” नूपुर ने कहा

“बिल्कुल चाहिए, मेरे अकेले की कमाई से वहाँ हमारा घर नहीं चलेगा. सुना है कि गुवाहाटी में कम्यूटर क्लासेस में टीचर की कमी है. तुम कम्यूटर सिखाओ. बाद में हम अपना खुदका सायबर कैफ़े खोलेंगे. कम्प्यूटर अभी आनेवाले समय मे भारत में लैंडलाइन टेलीफोन की तरह फैलेंगे. तो शुरुआती दौर में जिस तरह टेलीफोन बूथस ने खूब पैसे कमाए, वैसेही सायबर कैफ़े वाले कमाएंगे.” राकेश ने कहा.

“राकेश तुम कितना आगे का सोचते हो. फिलहाल अभी का नहीं सोच पा रहे हो. बाहर बारिश हो रही है.” नूपुर ने कहा

“तो?” राकेश ने पूछा

“बनो मत” कहते हुए नूपुर ने उसे किस किया.

इतने में शर्मा साहब आगये. दोनों ने अपने आप को किसी तरह संवार लिया. “बच्चों, मुझे अभी किशनगंज उतरना पड़ेगा. वहाँ से ब्रम्हपुत्र मेल से मुझे वापस दिल्ली जाना है. मैं परसो छुट्टी लेकर गुवाहाटी आऊंगा आपसे मिलने.” शर्मा जी ने कहा.

राकेश अब कुछ घबराया हुआ सा लग रहा था. किशनगंज स्टेशन आगया. आधी रात बीत चुकी थी. 2 अगस्त 1999 के सुबह के सवा एक बजे थे. किशनगंज स्टेशन पर कुछ बड़ा काम शुरू था. शर्मा साहब उतर गए. आनेवाले नए टीटीई से वो बात करनेवाले थे नूपुर और राकेश के बारे में.

“क्या मतलब त्यागी नहीं आया? ये कोई तरीका होता है? मैं 30 घण्टे से सफर कर रहा हूँ. सोया तक नहीं हूं ठीक से. मुझे नहीं मालूम. मैं गुवाहाटी से एक स्टेशन आगे नहीं जाऊंगा.” शर्मा साहब कुछ चिढ़ते हुए किशनगंज स्टेशन मास्टर से बोले.

“शर्मा जी कृपया सुनिए. हम आपसे गुजारिश करते है कि आप गुस्सा न करे. चलिए छोड़िये, ट्रेन वैसे भी काफी भरी हुई है, बिना टीटीई के जाने दे नही सकते और यहां से कोई यात्री चढ़ भी नहीं रहा है. आप गुवाहाटी तक आराम से सो कर जाइये. मैं वहाँ के स्टेशन मास्टर से बात करके आगे के सफर के लिए टीटीई दिलवाने को कहता हूं” स्टेशन मास्टर मिश्रा जी ने कहा.

शर्मा जी फिरसे इनके साथ आगये., उनकी थकावट देखते हुए राकेश ने कहा “नूपुर चलो थोड़ी देर दरवाजे पर खड़े रहके बारिश का मजा लेते है.”

टीटीई शर्मा सर थकान से सो गए. गाड़ी भी निकल पड़ी. किशनगंज पर उस रात शायद कोई काम पर ध्यान नहीं दे रहा था. अवध असम एक्सप्रेस सीधा निकल पड़ी.

बहुत ही तेज बारिश शुरू हुई. ट्रेन के पायलट श्रीमान रॉय को ट्रेन चलाते वक्त इतनी बारिश शायद पहली बार दिख रही थी. मुश्किल से सिग्नल दिख पा रहे थे. रॉय साहब ने फिर भी ट्रेन की गति को बरकरार रखा क्योंकि ट्रेन पहले से छह घंटा लेट थी.

इधर सीआरपीएफ के जवान मुकेश कुमार को भी नींद नहीं आ रही थी. कारगिल युद्ध मे मिलिट्री जहां पाकिस्तानी सैनिकों से निपट रही थी, वही सीआरपीएफ के जवान आतंकवादियों को ढूंढ ढूंढ कर मार रहे थे. सर पर कफ़न बांध कर मौत का तांडव करनेवाले मुकेश कुमार किसी अनभिज्ञ बात से चिंतित थे.

इधर दरवाजे पर ही एक दूसरे की बाहों में सिमटे हुए राकेश और नूपुर खड़े थे. किशनगंज छूटे अभी 15 मिनट हो चुके थे. दो साल पहले आई टाइटैनिक मूवी का सीन याद करते हुए नूपुर ने राकेश से ट्रेन के दरवाजे में टाइटैनिक की पोज देने के लिए कहा. वैसे ये था बड़ा मुश्किल लेकिन किसी तरह नूपुर की जिद को पूरा करने की नाकाम कोशिश राकेश करता रहा. बाहर बारिश बहुत तेज थी औए ट्रेन की रफ्तार उससे भी तेज.

टीटीई शर्मा साहब की अचानक से नींद खुल गई. किशनगंज से छूटते वक्त सामान्य नियमावली के अनुसार ट्रेन के बारे में रेगुलर जानकारी अगले स्टेशन गाइसाल को दे दी गई थी. अपनी रेलवे विभाग की बड़ी वाली टोर्च लेकर वो दूसरे वाले दरवाजे की ओर बढ़े. उन्होंने गौर से बाहर देखा और उनके होश उड़ गए.

डिब्बे के इस छोर वाले दरवाजे पर राकेश और नूपुर अभी भी खड़े थे. राकेश ने भी देखा कि टीटीई साहब कुछ परेशान से नजर आ रहे थे. बिना कुछ बोले वो अगले डिब्बे में चले गए. उन्हें इंजन तक जाना था पर दुर्भाग्य से बीच के जनरल डिब्बों में चलती गाड़ी से गुजरा नही जा सकता था. उन्होंने अपने पेजर से पायलट रॉय को संपर्क करने की कोशिश की पर तेज बारिश में वो भी मुश्किल था.

राकेश ने गौर से बाहर देखा. डर के मारे उसके हाथ कांपने लगे.

“क्या हुआ राकेश?” नूपुर ने पूछा.

“तुम सही कहती हो नूपुर. मैं आगे की इतना सोचता हूँ के अभी का सोचना रह जाता है. गौर से देखो बाहर, ग्रीन सिग्नल उस ट्रेन के लिए है जो बगल वाली पटरी से जानी चाहिए. मतलब हमारी ट्रेन उस पटरी से गुजरनी चाहिए.” – राकेश

“मतलब ट्रेन गलत पटरी पर है?” – नूपुर

“लगभग हाँ!” – राकेश

“तो अगले स्टेशन पर जाएगी ना सही वाली पटरी पर” – नूपुर

“चिंता वो नहीं है नूपुर, 15 मिनट में किशनगंज पर दूसरी ओर से ब्रम्हपुत्र मेल आनेवाली थी, ऐसी वहाँ पर अनाउंसमेंट भी हुई थी. मतलब वो इसी ट्रैक पर है. हमे किसी भी हालत में ट्रेन को रोकना होगा” कहते हुए राकेश शर्मा जी को जगाने चला गया पर शर्मा जी तो पहले ही आगेवाले डिब्बे में पहुंच चुके थे. राकेश दौड़कर चेन खींचने भागा लेकिन दुर्भाग्य से उस डिब्बे की सारी चेनें खराब हो रखी थी. शर्मा जी ने आगेवाले डिब्बे में पहुँचकर कर चेन खींच दी. ट्रेन की रफ्तार फिर भी इतनी ज्यादा थी की अभी भी कम से कम दो किलोमीटर आगे चलकर ही ट्रेन रुक सकती थी. भगवान को याद करते हुए शर्मा जी ने राहत की सांस ली.

“राकेश इधर आओ” नूपुर ने कहा

राकेश फिरसे दरवाजे पर आ गया. नूपुर ने उससे कुछ यूं नजर मिलाई की वो समझ गया. अपना वादा याद करते हुए उसने नूपुर को गले लगा लिया.

अगले ही पल भयावह धमाका हुआ. 100 की रफ्तार से आनेवाली ब्रम्हपुत्र मेल  उतनी ही रफ्तार से जानेवाली अवध असम एक्सप्रेस से बुरी तरह टकरा गई. अवध असम एक्सप्रेस का इंजिन 50 फिट तक हवा में उड़ गया. अवध असम एक्सप्रेस के 13 डिब्बे  ब्रम्हपुत्र मेल के डिब्बो के ऊपर चढ़कर उलझ गए. कईं डिब्बे हवा में उछले और गिरे. गिरते ही कईं सारे डिब्बो में आग लग गई. विस्फोट से यात्रियों के शरीर के टुकड़े आसपास के इलाकों तक उड़ गए. कईं सारे सेना के जवानों की जानें गई.  गहरे अंधेरे और तूफान बारिश के बीच इतने बुरे हादसे में बड़ी संख्या में दोनों ट्रेनों के यात्री बुरी तरह घायल हुए. उनकी चीखों की आवाज बारिश की आवाज में दबे जा रही थी. फिर भी चंद घंटों में वहाँ लोगों की भीड़ जमा हुई. रेस्क्यू टीम और कईं सारी एम्ब्युलेंस भी सुबह तक आ गई. लाशों को निकाल कर एक जगह लाइन से बिछाया जा रहा था. घायल लोगों को तुरंत अस्पतालों में भेजा जा रहा था. दोनों ट्रेनें क्षमता से कईं ज्यादा यात्रियों से भरी हुई होने की वजह से बहुत ज्यादा नुकसान हुआ.

अवध_असम_एक्सप्रेस Accident pictures

टकराव के समय दरवाजे पर खड़े रहने की वजह से टीटीई शर्मा साहब, राकेश और नूपुर, तीनों मौका ए वारदात से थोड़ा दूर जाकर गिरे. टीटीई शर्मा साहब को जब होश आया तब वो सिलीगुड़ी के सरकारी अस्पताल में थे. उनके सर पर गहरी चोट थी एवं हाथ की हड्डी टूट चुकी थी. जब उन्होंने डॉक्टर से कहा कि एक युवा और युवती भी मेरे साथ थे, तो डॉक्टर ने कहा इसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं मिली.

इधर 2 अगस्त की दोपहर 3 बजे रेलमंत्री नीतीश कुमार गाइसाल दुर्घटना स्थल पर पहुंचे. भीड़ उनपर काफी गुस्सा थी. नीतीश कुमार के अलावा ममता बनर्जी और कईं सारे बड़े स्थानीय राजनेता भी आकर चले गए. इतनी लाशें बिछने के बावजूद गाइसाल के आसमान में कोई गिद्ध या चील नजर नहीं आ रहा था, आनेवालों में तो बस राजनेता ही थे! नीतीश कुमार ने नैतिक जिम्मेदारी लेकर अपने रेलमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

इधर अस्पताल में अपने बेड से उठकर किसी तरह मुश्किल से चलते हुए शर्मा जी राकेश और नुपुर को ढूंढने लगे. पूरे अस्पताल में इसी दुर्घटना में घायल हुये यात्री बुरे हालातों में भर्ती कराए गए थे. वही मृतकों के शवों को जगह की कमी के चलते सुबह से अस्पताल के बाहर धूप में रखा था. मुर्दाघर तो पहले ही पूरा भर चुका था.

अस्पताल में कईं जगह सेना के जवान बुरी तरह से घायल पड़े थे. दुश्मन देश के सैनिकों के दिये घाव फिर भी पराये थे, पर अगर अपनों की लापरवाही की वजह से हमारे इन वीरों को वीरगति मिले, असली दुश्मन तो हमारे लापरवाह लोग, गैर जिम्मेवारी प्रशासन और भ्रष्ट नेता ही है ऐसा कहना पड़ेगा. सेना के कईं जवानों के शव पूरे शासकीय इंतजाम से उनके घर भेजे जा रहे थे. टीटीई शर्मा साहब ये देखते हुए गुस्सा एवं दुख से तिलमिला उठे और आंसुओं से  भरी निगाहें डालकर वो हर शव को जाकर सैल्यूट करने लगे. जिन्हें कारगिल युद्ध न मार पाया, उन्हें अपने ही देश की लापरवाही और भ्रष्टाचार मार गए.

पूरा अस्पताल ढूंढने के बाद टीटीई शर्मा जी अब माथे पर शिकन लिए बाहर पड़ी लाशों को देखने लगे. सबसे आखिर में एक दूसरे के बगल में रखे हुए दो शव देखते ही वो पहचान गए. जिनका प्यारभरा रिश्ता अपनी आंखों से उन्होंने देखा था, जिसकी मदद की वजह से उनकी पत्नी जिंदा थे वो राकेश और नूपुर अब निपचित पड़े हुए थे.  शर्मा जी रोने लग गए. पुलिस से जाकर फिर उन्होंने राकेश और नूपुर की पहचान बताई. पहचान बताते वक्त जान बूझ कर उन्होंने नूपुर का नाम नूपुर राकेश चतुर्वेदी बताया ताकि उसके घरवालों का पता न चले. शर्मा जी ने खुद अपने हाथों से दोनों का अंतिम संस्कार कर उन्हें अग्नि दिया.

ये न सोचना की राकेश और नूपुर का प्यार हार गया. शायद विधि के विधान में उनकी जिंदगी लंबी न थी, पर एक दूसरे की आंखों में आंखे डालकर, एक दूसरे की बाहों में दम तोड़ना ही मौत के आगे प्यार की सबसे बड़ी जीत है!

The End

Written By,

Dnyanesh Make “The DPM”

Post Script
2 अगस्त 1999 को हुई गाइसाल रेल दुर्घटना भारत के इतिहास की अब तक कि सबसे बड़ी रेल दुर्घटना है. ये दुर्घटना पूरी तरह से मानवीय कारण से हुई थी और इसे टाला भी जा सकता था. मृतकों का सरकारी आंकड़ा 285 है लेकिन असल मे 1000 से ज्यादा लोग इस हादसे का शिकार हुए थे. ये काल्पनिक प्रेमकथा किसी भी रूप से इस हादसे में मृत या घायल हुए लोगों को एवं उनके रिश्तेदारों की भावनाओं को आहत करने के लिए नहीं थी. इस हादसे में शहीद हुए सीआरपीएफ जवानों को मेरा शत शत नमन और मृत यात्रियों को श्रद्धांजलि!


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