
मुड़ी जो गाड़ी स्टेशन की ओर
ढूंढ रहे हम भाई एक छोर
की हमारी खुशियों का बचा निवाला
मिटाए भूख किसीकी जब तक हो भोर
दिन था सुहाना खुशियों से भरा
पीली हल्दी लगी पहनाया चूड़ा भी हरा
वीरे की हल्दी में सौ लोग आए
दुआएं दिए, खुश होकर, खाना भी खाए
अपनी जिंदगी अपने अरमानों और अपनों के बीच के चंद पल
तरस जाए इन्हीं लम्हों को बाकी तो है माया छल
भाई बहन सब बड़े, आधों के बने जीवनसाथी
एक जो अब बंधने जा रहा था वो हमारा महारथी
खूब सराहा खूब नवाजा दूल्हा हमारा खिल उठा
और बच्चों की किलकारियों से गोकुल ये झिलमिल उठा
शाम हुई खाना खाया और निकल पड़े सोने
वात्सल्य जाग उठा और कुछ यूं बोली मां बहने
जाओ बच्चों ये खाना जरूरतमंद को दे देना
अन्नपूर्णा प्रसन्न होंगी कुछ आशीर्वाद ले आना
देर रात होने लगी और निकले दूल्हे के भाई
बीसो रोटियां, दाल सब्जी के संग कुछ मिठाई
रेलवे स्टेशन पर भीड़ थी, चढ़ने उतरने वालों की
कुछ दिखे मगर जवानी में लिए झुर्रियां गालों की
बच्चे, बूढ़े औरतें, शायद ये एक परिवार था
प्लेटफॉर्म के बाहर बैठा शायद सुबह की ट्रेन का सवार था
बैठे थे शांत, बिना शिकायत किए, न मांग रहे थे किसीसे
मजदूरी कर लौट रहे थे टिकट के सिवा न थे शायद पैसे
पूछने पर बोले हां भूखे है लेंगे जो भी है
लेने के लिए हाथों के अलावा थे कुछ पतीले
हैरत हुई देखकर के लेते हुए उन्होंने,
न पूछा ताजा है न दिए कोई बहाने
शब्दों के शायद बेहद परे आंखों से राहत दिखी
धन्यवाद कर सके उतनी भी नहीं थी मन:शक्ति बाकी
उस रोज जाना के मै सच में हूं अमीर
भूखा रहना नहीं देखा, हररोज खाई मीठी खीर
जाना ये भी के मेरी क्या है शिकायतें
जो भी है लेकिन रात को सूखी नहीं है आंतें
हां पैसा कम ज्यादा होगा लेकिन ये मंजर तो नहीं
टिकट ले या खाना खाए, ऐसा कोई डर तो नहीं
कुछ सीखा उन लोगों से मैने उस दिन जरूर
जिंदगी से शिकायतें करने का उतर गया सुरूर
अबके हर निवाला जैसे प्रसाद लगने लगा है
अबके खाना खा पाना राजसी ठाठ लगने लगा है
भगवान करे ये मेरी दुआ उनको लग जाए
मुझे इतना सिखाने वालों के भाग्य अब जग जाए
भगवान उन्हें कम से कम खाना मिलता रहे
और मेरे अहंकार का सूरज इसी खूबसूरती से ढलता रहे
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